Monday, April 25, 2011

याद

कभी सोचा नहीं था कि मैं इतना मुस्कुराऊँगा
कभी सोचा नहीं था कि उन्हें इतना याद आऊँगा
उन्हें याद आना है बेवफाई मेरी पर क्या करू
उन्हें याद आकर सारी रात मैं सताऊँगा
तैरूँगा रात भर मैं भी आंसूओं के समंदर में
सुबह उतर कर पार हो जाऊँगा
बस यादो के मौसम में कभी डूबकर यूँ ही
किसी अपने के पास चुपके से पहुँच जाऊँगा

Saturday, April 23, 2011

चाय

जितना मुश्किल था सवाल मेरा


उतना ही आसान आया जवाब उनका


ज़िन्दगी क्या है?


चाय की प्याली कपकपाते हाथो में लेकर


बच्चे सी मासूमियत से चुस्की ली


फिर पूपले मुह से तुतलाए


चाय ज़िन्दगी है


अटपटा सा जवाब लगा


पुछा कैसे भला


दूजी चुस्की के बात वह फिर तूत्लाये


चाय ज़िन्दगी है


ज़िन्दगी कडवाहट है चाय पट्टी की तरह


ज़िन्दगी मीठी है शक्कर की तरह


ज़िन्दगी हौले से जियोगे तो जी जाओगे


जल्दी जल्दी में जल जाओगे


करके अपनी तुत्लाई बातों से कायल मुझे


दुबारा लेने लगे चुस्की


एकदम आसान सी ज़िन्दगी की तरह


अब मुझे भी लग रही है


चाय की इच्छा


चाहस .................

सन्नाटा

यह कैसा सन्नाटा है जो कान फोड़ता है
यह सन्नाटा भी कितने सवाल बोलता है
इस सन्नाटे में कितनी आवाजें हैं
हर मोड़ पर भेडिये हैं तैयार झपटने को
यह सुहानी शाम का सन्नाटा है
या काली रात के बाद की उदास सुबह का सन्नाटा
यह फर्क अब मुश्किल है कर पाना
यह सन्नाटा ........................

Friday, March 18, 2011

होली

होली का त्यौहार है आया,
खुशियों की सौगात है लाया।
चुन्नू मुन्नू बाहर आओ,
सब लोगो को रंग लगाओ।
देखो किसी को भूल न जाना,
सबको तुम खुशियाँ दे जाना।
फगुआ आया नाचो गाओ,
पीला हरा गुलाल उड़ाओ।
रंग मलो चेहरे पर पहले,
फिर ज़ोरों से हंसो हंसाओ।
होली का त्यौहार है आया,
खुशियों की सौगात है लाया।

Sunday, March 13, 2011

सब कुछ झूठा सा लगता है

कभी कभी जब डिगता है विश्वास मेरा
जाने क्यों झूठा लगता है हर ख्वाब मेरा
धरती पर अम्बर झुकता है धीरे धीरे
जाने क्या कहता है रिसता है जब पानी नभ से
झूठी लगती है दरिया की वह धार मुझे
झूठा लगता है धरती का श्रिंगार मुझे
झूठा लगता है राधा का फिर प्यार मुझे
पथरायी, सूनी, अलसाई सी आँखों से
झर झर कर सपने सब मेरे गिरते हैं
सब कुछ झूठा सा लगता है
कभी कभी जब डिगता है विश्वास मेरा
जाने क्यों झूठा लगता है हर ख्वाब मेरा ।

Thursday, March 10, 2011

मातृत्व का एहसास

रोज़ की तरह
मैं आज भी जा रहा हूँ
अपने उसी रास्ते से,
जिस रास्ते पर बैठती है एक बढ़ी "माँ
उसकी झुर्रियों वाली गोदी में चिपका रहता था उसका "लाल",
अपने खुरदरे हाथो से
वह माँ रोज़ अपने लाडले को देती थी मातृत्व का स्पर्श
एहसास कराती थी उसे कि वह उसकी "माँ" है
अभी कल ही तो उसने छीना था एक अमरुद
उस ठेले वाले से जो रोज़ गुजरता था उधर से
उसने खुद नहीं खाया था उसे
बल्कि वार दिया था उस फल को अपने "लाल" पर
उसी पेड़ के नीचे जहाँ वह रोज़ होती थी
आज वहां पर पड़ा है उसका निर्जीव शरीर
और उसका "लाल" सहला रहा है उसके
उन्ही झुर्रीदार हाथो को
जिनसे वह रोज़ कराती थी अपने "लाल" को
मातृत्व का एहसास.............

और अचानक एक दिन

और अचानक एक दिन
तुम थी नहीं मेरे पास
सुबह हर रोज़ की तरह तुमने मुझे जगाया ही नहीं
कितना खोजा था मैंने तुमको
अपने बिस्तर की सिलवटों में
तुम्हारी कंघी में भी खोजा था
जिसमे तुम्हारे बाल फस गए थे
और तुमने झटक कर फेक दिया था दूर उसे
मैं नहीं जनता था एक दिन तुम झटक दोगी वैसे ही मुझको भी
मैंने तुमको बगीचे के फूलों में भी खोजा था
जिनको रंग और महक देने जाती थी तुम हर सुबह
तुम नहीं थी वहां भी
तुम चली गयीं मुझे छोड़ कर उस रोज़ चुपके से
सोचा भी नहीं क्या होगा मेरा
बस चली गयीं तुम यूँ ही
मंदिर की देवी की तरह पूजता हूँ आज भी तुम्हे हर पल
तुम्हारी तस्वीर पर रोज चढ़ाता हूँ ताजे फूल
उन पौधों के जिनको तुमने रोपा था मेरे आँगन में
यह कहकर की यह मह्कायेंगे हमारा जीवन
पर अब वह फूलों की डाली भी मुरझाने लगी है
हर रोज़ तुम्हारे आने की बाट जोहता है वह पौधा
जिसे तुमने रोपा था अपने हाथों से
और अचानक एक दिन .......